आप ऑफिस में गधों की तरह मेहनत तो बहुत कर रहे हैं पर लोग आपको फिर भी हल्के में लेते हैं? शायद आपकी घटिया बातचीत का तरीका आपकी इमेज की धज्जियां उड़ा रहा है। अगर आप अभी भी भीगी बिल्ली की तरह बात कर रहे हैं तो अपनी अथॉरिटी और प्रमोशन को भूल ही जाइए।
आज हम सारा मैक्गिंटी की किताब पावर टॉक से सीखेंगे कि कैसे अपनी जुबान का सही इस्तेमाल करके आप लोगों पर अपना दबदबा बना सकते हैं। चलिए इन 3 पावरफुल लेसन्स को गहराई से समझते हैं।
Lesson : लैंग्वेज ऑफ पावर बनाम लैंग्वेज ऑफ रिलेशनशिप
सोचिए, आप ऑफिस के मीटिंग रूम में बैठे हैं। आपके सामने आपका बॉस है जो शायद कल रात की अधूरी नींद की वजह से थोड़ा चिड़चिड़ा है। अब यहाँ दो तरह के लोग होते हैं। पहले वो जो अपनी बात ऐसे रखते हैं जैसे किसी ने उनके गले पर चाकू रखा हो। और दूसरे वो जो इतना मीठा बोलते हैं कि सामने वाले को डायबिटीज हो जाए। सारा मैक्गिंटी कहती हैं कि अगर आप अपनी अथॉरिटी बनाना चाहते हैं तो आपको इन दोनों के बीच का अंतर समझना होगा। इसे वो कहती हैं लैंग्वेज ऑफ पावर और लैंग्वेज ऑफ रिलेशनशिप।
लैंग्वेज ऑफ पावर का मतलब यह नहीं कि आप कमरे में घुसते ही सबको गाली देना शुरू कर दें। नहीं भाई वह तो बदतमीजी हो जाएगी। इसका मतलब है सीधे पॉइंट पर आना। बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी बात रखना। मान लीजिए आपको अपनी टीम को एक डेडलाइन याद दिलानी है। अब एक तरीका है कि आप कहें शायद हमें यह काम कल तक खत्म कर लेना चाहिए अगर सबको ठीक लगे तो। भाई साहब यहाँ आप परमिशन मांग रहे हैं या भीख? यह है कमजोर भाषा। वहीं लैंग्वेज ऑफ पावर कहती है कि आप सीधा बोलें हमें यह प्रोजेक्ट कल शाम पांच बजे तक हर हाल में पूरा चाहिए। पॉइंट खत्म।
अब आते हैं लैंग्वेज ऑफ रिलेशनशिप पर। यह भाषा तब काम आती है जब आपको लोगों का दिल जीतना हो। जब आपको लगे कि आपकी टीम पहले से ही प्रेशर में है और अगर आपने उन पर और हुकुम चलाया तो शायद वो आपके कॉफी मग में थूक दें। यहाँ आपको थोड़ा सॉफ्ट होना पड़ता है। यहाँ आप कहते हैं कि मैं जानता हूं कि काम का लोड बहुत है पर हम साथ मिलकर इसे मैनेज कर लेंगे।
दिक्कत तब आती है जब आप गलत जगह गलत भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इमेजिन करिए आप अपनी डेट पर गए हैं और वहां आप लैंग्वेज ऑफ पावर झाड़ रहे हैं। मुझे कल तक तुम्हारा जवाब चाहिए कि हम शादी कर रहे हैं या नहीं। यकीन मानिए वह लड़की अगले सेकंड ब्लॉक कर देगी। और वहीँ ऑफिस में जहां आपको स्ट्रिक्ट होना है वहां आप कह रहे हैं अरे भाई बुरा मत मानना पर क्या तुम थोडा सा काम कर लोगे? ऑफिस वाले आपको टिशू पेपर समझकर इस्तेमाल करेंगे और फेंक देंगे।
असली खिलाड़ी वही है जो जानता है कि कब उसे शेर की तरह दहाड़ना है और कब उसे एक समझदार दोस्त की तरह बात करनी है। अगर आप हमेशा पावर मोड में रहेंगे तो लोग आपसे नफरत करेंगे। और अगर हमेशा रिलेशनशिप मोड में रहेंगे तो लोग आपको हलवा समझेंगे। सारा हमें सिखाती हैं कि सिचुएशन को पढ़ो। अगर मामला सीरियस है तो सीधा वार करो। अगर माहौल इमोशनल है तो जुबान में थोड़ी मिठास लाओ। बिना इस बैलेंस के आप कभी भी इन्फ्लुएंस नहीं बना सकते। तो अगली बार जब आप मुंह खोलें तो पहले यह सोचें कि सामने वाला आपकी इज्जत करने वाला है या आपको इग्नोर।
Lesson : कॉन्फिडेंस के साथ अपनी बात रखना
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपने मीटिंग में बहुत ही धांसू आईडिया दिया, लेकिन किसी ने सुना ही नहीं? और फिर दो मिनट बाद वही सेम बात आपके बगल वाले चिंटू ने थोड़े ऊंचे सुर में कह दी, और सबने तालियां बजाना शुरू कर दिया? सच तो यह है कि दुनिया आपके आईडिया को नहीं, उसे पेश करने के तरीके को देखती है। सारा मैक्गिंटी कहती हैं कि अगर आपकी भाषा में कॉन्फिडेंस की कमी है, तो आपका आईडिया चाहे सोने का क्यों न हो, लोग उसे कचरा ही समझेंगे।
अक्सर हम अपनी बात कहने से पहले ही खुद को सरेंडर कर देते हैं। हम कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जिन्हें सारा ने कमजोर शब्द कहा है। जैसे कि, मुझे लगता है कि शायद यह सही हो सकता है या मैं तो बस यह सोच रहा था कि। भाई साहब, अगर आपको खुद ही लग रहा है और आप खुद ही सोच रहे हैं, तो सामने वाला आप पर दांव क्यों लगाए? यह तो वही बात हो गई कि आप डॉक्टर के पास जाएं और वह कहे, मुझे लगता है कि शायद यह वाली नस काटनी चाहिए। क्या आप उससे आपरेशन कराएंगे? बिल्कुल नहीं।
कॉन्फिडेंस दिखाने का मतलब अपनी आवाज में दम पैदा करना है। अपनी बातों से यह डगमगाते हुए शब्द हटा दीजिए। मैं बस इतना कहना चाहता था की जगह सीधा बोलिए, मेरा सुझाव यह है। जब आप अपनी बात में वजन लाते हैं, तो लोग खुद-ब-खुद आपको सुनने के लिए मजबूर हो जाते हैं। लोग अक्सर डरते हैं कि कहीं वो ज्यादा डोमिनेटिंग न लगें, इसलिए वो अपनी बातों में सॉरी या शायद जोड़ देते हैं। बिना गलती के सॉरी बोलना बंद कीजिए। यह आपके सेल्फ रिस्पेक्ट की नीलामी करने जैसा है।
एक और मजेदार बात, कुछ लोग अपनी बात को सवाल बनाकर पूछते हैं। जैसे, हमें यह स्ट्रेटजी बदलनी चाहिए, है न? यह है न आपकी पूरी अथॉरिटी का गला घोंट देता है। आप सामने वाले से वैलिडेशन मांग रहे हैं। सारा कहती हैं कि एक लीडर कभी अपनी बात की पुष्टि के लिए दूसरों के मुंह की तरफ नहीं देखता। वह अपनी बात को स्टेटमेंट की तरह रखता है, सवाल की तरह नहीं। अगर आपको अपनी बात मनवानी है, तो आपकी आवाज में वह यकीन दिखना चाहिए जो पहाड़ हिला सके।
याद रखिए, वर्कप्लेस पर कोई आपकी शक्ल देखकर आपको प्रमोशन नहीं देगा। आपकी जुबान ही आपका सबसे बड़ा हथियार है। अगर आप डरे-सहमे चूहों की तरह बात करेंगे, तो बिल्ली बनकर लोग आपको खा जाएंगे। कॉन्फिडेंस का मतलब चिल्लाना नहीं है, बल्कि शांति से और बिना हिचकिचाहट के अपनी बात को सही शब्दों में पिरोना है। जब आप अपनी भाषा से इन कमजोर कड़ियों को निकाल देते हैं, तब जन्म होता है एक असली इन्फ्लुएंसर का। तो आज से ही अपने शब्द बदलिए और अपनी तकदीर बदलते हुए देखिए।
Lesson : सिचुएशन के हिसाब से अपनी टोन बदलना
क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही इंसान ऑफिस में शेर बना रहता है और घर जाते ही भीगी बिल्ली बन जाता है? इसे ही कहते हैं अडैप्टेबिलिटी। सारा मैक्गिंटी कहती हैं कि पावरफुल बातचीत का सबसे बड़ा सीक्रेट यह नहीं है कि आप क्या बोलते हैं, बल्कि यह है कि आप किससे और किस माहौल में बोल रहे हैं। जो लोग एक ही घिसी-पिटी टोन लेकर हर जगह घूमते हैं, वो अक्सर लाइफ की रेस में पीछे छूट जाते हैं। आप अपनी मम्मी को यह नहीं कह सकते कि मुझे कल सुबह नौ बजे तक नाश्ता टेबल पर चाहिए, वरना आपकी परफॉरमेंस रेटिंग कम कर दी जाएगी। वहां आपको रिलेशनशिप मोड में ही रहना होगा।
इन्फ्लुएंस का मतलब यह नहीं कि आप एक रिकॉर्डर बन जाएं जो हर जगह एक ही धुन बजाता है। एक चतुर कम्युनिकेटर एक गिरगिट की तरह होता है, जो माहौल को भांपते ही अपनी बातचीत का रंग बदल लेता है। जब आप अपने क्लाइंट से बात कर रहे हों, तो आपकी टोन प्रोफेशनल और भरोसेमंद होनी चाहिए। लेकिन जब आप अपने जूनियर के साथ लंच पर हों, तो वही टोन थोड़ी दोस्ताना और रिलैक्स्ड होनी चाहिए ताकि वह आपसे अपनी परेशानियां शेयर कर सके। अगर आप वहां भी सीना तानकर खड़े रहेंगे, तो लोग आपको इन्फ्लुएंसर नहीं बल्कि एक ईगो वाला इंसान समझेंगे।
कुछ लोग इतने कन्फ्यूज होते हैं कि वो सीरियस मीटिंग में जोक्स मारते हैं और पार्टी में ऑफिस की डेडलाइन डिस्कस करते हैं। ऐसे लोगों को कोई भी गंभीरता से नहीं लेता। सारा का कहना है कि आपको अपनी टोन को ट्यून करना होगा। इसे ऐसे समझिए जैसे आप रेडियो का चैनल सेट कर रहे हों। अगर फ्रीक्वेंसी मैच नहीं हुई, तो सिर्फ शोर सुनाई देगा, संगीत नहीं। आपकी आवाज की पिच, आपकी बोलने की स्पीड और यहाँ तक कि आपके बैठने का तरीका भी सामने वाले को मैसेज भेजता है।
अगर आप किसी बड़ी डील को क्लोज करना चाहते हैं, तो अपनी आवाज में ठहराव लाइए। जल्दी-जल्दी बोलना घबराहट की निशानी है। वहीं अगर आपको किसी को मोटिवेट करना है, तो आपकी आवाज में थोड़ी एनर्जी और उत्साह होना चाहिए। यह सब कोई जादू नहीं है, बल्कि एक स्किल है जिसे प्रैक्टिस से सीखा जा सकता है। याद रखिए, आप अपनी भाषा के जरिए दूसरों के दिमाग में अपनी एक इमेज पेंट कर रहे होते हैं। अब यह आप पर है कि आप वहां एक कमजोर इंसान की तस्वीर बनाते हैं या एक निडर लीडर की।
पावर टॉक सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है, यह आपकी पर्सनालिटी का आइना है। अगर आप वही पुराने घिसे-पिटी तरीके से बात करते रहे, तो दुनिया आपको कुचलकर आगे निकल जाएगी। लेकिन अगर आपने इन तीन लेसन्स को अपनी लाइफ में उतार लिया, तो यकीन मानिए, जब आप बोलेंगे तो लोग रुककर सुनेंगे। आप सिर्फ एक कर्मचारी नहीं, एक अथॉरिटी बन जाएंगे।
तो क्या आप आज से ही अपने उन कमजोर शब्दों को कचरे के डिब्बे में फेंकने के लिए तैयार हैं? कमेंट्स में YES लिखें अगर आप अपनी आवाज की ताकत को पहचान चुके हैं। इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसे ऑफिस में अपनी बात रखने में डर लगता है। आपकी एक सलाह किसी का करियर बदल सकती है। उठिए, बोलिए और छा जाइए।
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